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क़लम की विटामिन

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जब लिखाई शुरू हुई थी, उस समय केवल भावनाएँ थीं। जैसे लिखने का ल भी न जानने वाले को कलम थमा देना ! भाषा ज्ञान न के बराबर था। जैसे, जो बात मन में आती, कागज़ पे उतरती जाती। व्याकरण, वर्तनी छटपटा कर कहीं कोसो दूर रह जातीं।  आप लेखनी के विटामिन रहे हैं। एक दिन भैया से बात हुई। उन्होंने व्याकरण और वर्तनी में सुधार करने का सुझाव दिया। व्याकरण मैंने पढ़ लिया। वर्तनी को लेकर भी सजग हो गया।  लेकिन अपने (लिखे) में कमी ढूढ़ पाना मुश्क़िल होता है। अपनी कहानी सदैव सही लगती है। इसका हल भैया में ही मिला। सुधार के लिए मैं हर बार भैया से गुहार करने लगा। शायद ही ऐसी कोई कहानी या लेख हो, जिसका परिमार्जन उन्होंने ने न किया हो। 'हुण्डी' कहानी की समीक्षा में भैया की लिखी कविता से भाव-विभोर हो गया। ख़ैर, ऐसा उन्होंने विटामिन भरने के लिए लिखा है, उनको मालूम है कि सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है और रहेगी। कविता का दूसरा पहलू यह भी लगा कि भैया मेरे लिखे से पक गए हों और जी छुड़ाना चाह रहे हों।  फिर मैंने अपनी पटरी से उतरी सोच को वापस पटरी पर ले आया। नादान क़लम इस विटामिन के लिए आभारी है।    -काशी क...

हुण्डी (कहानी)

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फलते-फूलते शहर का वह मन्दिर। उस मन्दिर में कोई लक्ष्मी जी की मूर्ति नहीं थी, परन्तु उसमें लक्ष्मी का जैसे साक्षात वास था। किसी धार्मिक स्थल की संपन्नता उसके आस-पास बसे लोगों की धनाढ्यता पर निर्भर करता है। इससे अधिक उन लोगों की उदारता मायने रखती है। आए दिन मन्दिर में सोने-चाँदी के चढ़ावे चढ़ते थे। मन्दिर में माथा टेकने की जगह से अधिक हुण्डियाँ ( दानपात्र)  विराजमान थीं। आदमी अगर दो-चार हुण्डियों को अनदेखा कर भी दे, बिना इनमें कुछ दान किए मन्दिर की चौखट पार नहीं कर सकता था। जैसे हुण्डियाँ बोल रही हों कि अब बहुत अनदेखी कर लिये, प्रभु सब-कुछ देख रहे हैं। इस आध्यात्मिक अपराध बोध की अनदेखी भला कोई कैसे कर सकता था! ईश्वर लोगों की मन्नतें पूरी करते और लोग मन्दिर की हुण्डी स्वेच्छा से भरते जाते। मन्दिर संस्कृति का भी केन्द्र था। समय-समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन करवाता था। इन कार्यक्रमों के टिकट लगते थे। इन आयोजनों से मन्दिर के खज़ाने में रातों-रात बढ़ोत्तरी होती थी। आते-जाते लोग हुण्डी में अपनी श्रद्धा से जो दान देते, वो तो अलग से बोनस! मन्दिर में जगह-जगह दान करने की विभिन्न विधिय...

हुआ करता था घर जो, अब मकान हो गया है। (कविता)

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महल जैसा तना है, बहुत ग़ुमान हो गया है, हुआ करता था घर जो, अब मकान हो गया है। छतें जो छाँव करती थीं, अब धूप बरसाती हैं सूखके हर रिश्ता जैसे रेगिस्तान हो गया है।  रेशमी तारों से जुड़ता था जो रिश्ता अब गाँठों का खदान हो गया है। जितने ऊँचे मकान हैं उनसे ऊँची दीवारें इस मकान का हर शख़्स अनजान हो गया है। मेरे ग़रीब-ख़ाने में क्या है कि महल जल उठा है! और धुआँ-धुआँ सारा आसमान हो गया है। -काशी की क़लम 

मौत की गली

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वो शहर की सबसे ज़िंदा जगह थी। रात ऐसी जगमग रहती कि जैसे सूरज अस्त हुआ ही नहीं। लोगों की ख़ुशियों का पैमाना वहाँ जाके छलकता था। जोश जैसे वहाँ की हवा में घुला हो। माहौल में ऐसी ऊर्जा कि कोई कितना ही मायूस हो, उन गलियों से गुज़ते वक़्त मुस्कान उसे गुदगुदा ही जाए । वाक़ई में वो जगह ख़ुशियो का पता थी। मगर आज की रात जश्न मनाने के लिए इंसान नहीं आये थे। वहाँ तमाम योनियों की भटकी हुई आत्माएँ आई थीं। जैसे उन आत्माओं ने अपना वास्तविक कपड़ा उतारकर, दूसरी योनि का चोला पहन लिया हो। ज़िंदा लोगों वाली सड़कों पे उस रात कंकाल ही कंकाल चल रहे थे। कुछ चेहरे ख़ून से लथपथ थे। कुछ ज़ोंबी के थे। नरभक्षी भी वहाँ ख़ून के प्यासे बने घूम रहे थे। चुड़ैलें भी अपने कटे-फटे चेहरों को सिलकर जश्न मनाने आई थीं। वो रात हैलोवीन की थी। लाखों युवक-युवतियाँ हैलोवीन का जश्न मनाने उस जगह इकट्ठा हुए थे। कोई कितना ही क़रीबी हो, अपने दोस्त को बिना परिचय पहचान नहीं सकता था। उन परिधानों ने सबकी पहचान मिटाकर उस रात की एक नई प्रेतीय पहचान दे दी हो। सब लोग हैलोवीन के कॉस्ट्यूम में थे। लोग एक-दूसरे के साथ फ़ोटो खींचके तुरन्त ...

मातृभाषा की एक परिभाषा

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 सादर प्रणाम! जिस भाषा में आप बोलना शुरू करते हैं, जिस भाषा में आप आप होते हैं, जिस भाषा में आपको कोई फ़िल्टर लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, जिस भाषा में आप मुस्कुराने से लेके हुँकारने तक का काम कर सकते हैं, जिस भाषा में आपके भाव बिन प्रयास बहें जिस भाषा को सीखने में आपको कम मेहनत करनी पड़े, और सबसे महत्त्वपूर्ण बात,  जिस भाषा को अंतिम साँस में भी बोला जा सके, वह आपकी मातृभाषा है। बाक़ी सब शुरू के अंत तक अपने आपको बनाए रखने का माध्यम है। मेरी यह सौभाग्यवश हिन्दी है। हिन्दी दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएँ। -काशी की क़लम

“महाभारत में ही गीता निकलती है।”

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 “महाभारत में ही गीता निकलती है” भागदौड़ के इस दौर में ‘बहुत व्यस्त हूँ’ वाली लाइन अक़्सर सुनने को मिलती हैं। इस व्यस्तता के पीछे कई कारण हो सकते हैं। महत्त्वपूर्ण ये है कि ऊर्जा की खपत बनाने में हो रही है, या बिगाड़ने में। मुझे ज्ञानपीठ प्रकाशन के  आदरणीय श्री दिनेश जी ने बड़े आकर्षक ढंग से व्यस्तता के कारणों को समझाया था। “हर आदमी या तो मस्त है या पस्त है। मस्त है-बनाने या बिगाड़ने में; पस्त है- ख़ुद को सम्भालने में।” इन तमाम व्यस्तताओं को पटखनी देता हुआ आदमी जीवन के उस पड़ाव पे पहुँचता है, जहाँ उसे आराम करने की सूझती है। औरों के लिए जीवन न्योछावर कर अन्तिम दौर में वो स्वार्थी बनाने की क़ोशिश करता है कि बची-कुची साँसें वह स्वयं के लिए लेगा। इस वह वो अपने पीछे की उपलब्धियों से इतना संतुष्ट हो जाता है कि आगे कुछ पाने की इच्छा नहीं रह जाती। ऐसे में एक उदाहरण मुझे अपवाद स्वरूप मिलते हैं आदरणीय डॉ. राम सुधार सिंह, हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष, उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी। सर जी ७० से अधिक बसंत देख चुके हैं। वे काग़ज़ पे तो अवकाश प्राप्त हैं, परन्तु अवकाश प्राप्ति की नई परिभाष...

तेरह साल बाद आप अपने बच्चे में क्या ढूंढ़ेंगे ? (अमेरिकी संस्मरण)

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 तेरह साल बाद आप अपने पाँच साल के बच्चे में क्या ढूंढ़ेंगे ?(अमेरिकी संस्मरण) छोटी बेटी का दर्ज़ा बड़ा हो गया था। अब वो प्री-स्कूल से किंडरगार्टन में जाने वाली थीं । दर्ज़े के साथ-साथ स्कूल भी काफ़ी बड़ा हो चला था। अमेरिका में प्राइमरी स्कूलों में कक्षाएँ किंडरगार्टन से लेकर दर्ज़ा पाँच तक की होती हैं। नए स्कूल से ओरिएंटेशन का निमंत्रण था। स्कूल के सभी अध्यापकों का अभिभावकों से प्रथम परिचय का दिन। प्रधानाचार्य महोदय जी उस परिचय शो के संचालक थे। उनकी उम्र तक़रीबन साठ साल पार होगी। बाल चमकते, जैसे चाँदी। चेहरे पे तेज, जैसे जलती बाती। उम्र भले ही चढ़ गई हो, लेकिन उनका जज़्बा…छः साल के बच्चों जैसा। शायद उनकी ऊर्जा का राज़ “ A man is known by the company he/she keeps” की लाइन में छुपा हो। बच्चों की चंचलता, उत्सुकता के बीच रहते-रहते मानिए ये गुण प्रधानाचार्य महोदय के अंदर समाहित हो गये हों। अपना परिचय देने के बाद उन्होंने वहाँ उपस्थित सभी अभिभावकों से एक सवाल पूछा,” आपका बच्चा/बच्ची लगभग तेरह साल बाद यूनिवर्सिटी में पढ़ने जाएगा/जाएगी। यूनिवर्सिटी में जाने के लिए आप बच्चे में क्...

पिता (कविता)

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छायांकन: काशिका पिता के कन्धों का भार जानने को सीढ़ी चढ़नी पड़ती है, पौधे से बाग़बान तक की एक पीढ़ी चढ़नी पड़ती है। पिता के जूते की कोई नाप नहीं हो सकती है, मूक संघर्षों की कोई छाप नहीं हो सकती है। जिस उँगली को पकड़कर चलना पड़ता है। उसका मर्म समझने को उँगली पकड़ाकर चलना पड़ता है। ये छाता बच्चों को धूप-बारिश से बचाता है, कहीं साथ छूट न जाए, अपना जीवन-बीमा भी करवाता है। पिता के छाते का कपड़ा भले ही कट-फट जाए, मज़ाल है कि सुरक्षा की कमानी ज़रा भी हट जाए। जीवन काग़ज़ की नावों का खेल नहीं है, यह दरिया बस मीठी यादों का मेल नहीं है। इसे पार करने लहरों से टकराना पड़ता है, पिता को बच्चे को माँझी बनाना पड़ता है। -काशी की क़लम

‘गंगा मैया ने बुलाया है’ (कविता)

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( यह कविता उसी समय लिखी गई थी, जब भारत माँ के बच्चे अकाल कोरोना की बलि चढ़ रहे थे और गंगा मैया अपने घाटों की दशा देख जमके पत्थर हो गई थीं! किन्हीं कारणों से प्रकाशित नहीं हो पाई।) (कोरोनो की लहर में बलिदान हुए अपनों को समर्पित। गंगा माँ की व्यथा) भाग-१: माँ की पीर ‘गंगा मैया ने बुलाया है’ ऐ बेटे कहाँ हो! बज्रपात पड़ा है, मेरे लाल, कहाँ हो? मेरे घाट पटे जा रहे हैं,वे  मेरा माथा ढँके जा रहे हैं, मेरे कंधे टूट रहे हैं, मेरे हाथ सारे कटे जा रहे हैं। सूखे पेड़ जलकर भस्म हो चले हैं, हरे-भरे अब अकाल धुंध हो रहे हैं। मैं पृथ्वी अवतरण का मूल भूली नहीं हूँ, मैं माँ हूँ, अकाल मोक्ष की सूली नहीं हूँ। मैं बहती हूँ सबके कल्याण के लिए, प्यास बुझाने, पोषण करने के लिए। काली घटाओं को काटने, हर तिनका हरा करने के लिए, तुलसी-दल ही नहीं, मैं आई गंगाजल बनने के लिए। अब बच्चे बिन बुलाये गोद आ रहे हैं, एक-एक कर मेरी कोख में समा रहे हैं। वे कराह रहे, माँ! मेरे पीछे छूटा अधूरा संसार है, ऐसे क्यों बुलाया? अभी तो मोक्ष भी दुश्वार है। कोख सूनी, मांग सूनी, सूनी बहुत कलाई है, घरों का कोना सूना, विरह यादों की परछाई ...

क़ानून के प्रतीक का उद्भव (इवोल्यूशन) आवश्यक है।

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क़ानून के प्रतीक का उद्भव (इवोल्यूशन) आवश्यक है।  ट्रेन का अनोखा अनुभव एक बार ट्रेन में एक दृष्टिहीन आदमी कुछ सामान बेच रहा था। एक यात्री ने चालीस रुपये का सामना ख़रीदा। यात्री ने दस का नोट अंधे के हाथ में थमाते हुए बोला लो पचास रुपये का नोट। अंधे ने नोट को एक हाथ की तर्जनी और अँगूठे के बीच पकड़ा और दूसरे हाथ की उन्हीं दो अंगुलियों के बीच से पूरी नोट को सर्र-से सरका दिया। मानो रेल की पटरी रेल की लम्बाई नाप रही हो! अंधे ने बिना किसी आश्चर्य के बोला “ ये दस का है!” असल में यात्री को भी बेईमानी नहीं करनी थी, वो एक परीक्षा ले रहे थे। कमज़ोर के लिए कसौटी क़दम-क़दम पे बिछी रहती है। कोई भी उठकर परीक्षा ले लेता है। यात्री का चेहरा पानी-पानी हो गया! कुछ ज्ञान-विज्ञान शोध से यह सिद्ध हुआ है दृष्टिहीन व्यक्ति की बाक़ी की ज्ञानेन्द्रियाँ-सुनने की शक्ति, स्पर्श करने की शक्ति, सूँघने की शक्ति-आम दृष्टि वाले से कहीं अधिक विकसित होती हैं। दिमाग़ अपने कनेक्शन इस प्रकार जोड़ लेता है कि न देख पाने की कमी की भरपाई दूसरी इंद्रियाँ कर देती हैं।  निष्पक्ष न्याय के लिए क़ानून को अंधा दर्शाया गया है। ...