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ज़िंदगी और मैं…(कविता)

ज़िंदगी और मैं…(कविता) ज़िन्दगी और मेरा कुछ यूँ सिलसिला रहा, माँगा जो मिला नहीं पर नहीं कोई गिला रहा।  ज़िन्दगी पे बहुत दावे रहे, पर इसके न कोई वादे रहे, मेरी क़ाबिलियत से परे देने के इसके हमेशा इरादे रहे।  मैं तो था खोटा सिक्का, ज़िन्दगी ने जहान में चलाया, चलना न सकता था उसे घोड़ों की दौड़ में दौड़ाया। इस गँवार को ज़िन्दगी ने इतना प्यार दिया, चुका न पाऊँ मैं कभी इतना उधार दिया। दौलत शोहरत की आरज़ू किसे है आख़िर, दिल-ओ-जान से मुसाफ़िर के हों कुछ मुंतज़िर। ज़िंदगी तेरी मियाद मुझसे लोग सालों में पूछते रहे, हिसाब क्या बताऊँ कि हम ज़िंदगी साँसों में जीते रहे।  मनचाहे गीतों की प्लेलिस्ट मुराद में आती रही, पर अच्छे रहे हैं गीत, रेडियो से तुम जो भी सुनाती रही।  -काशी की क़लम 

The Divine Niagara Falls (Poem)

The beauty is limitless, unbroken, and grand, A panoramic vision, fierce across the land. Nature’s unmatched glory shines in this light, The wondrous Niagara Falls , a magnificent sight. Its form is boundless, infinite in size, As if the Water God takes shape before our eyes. The relentless white torrent cascades and flows, As if the Ocean of Milk washes Earth's toes. Like the Ganges surging with a vow in her soul, Flowing to consecrate the sacred shrines whole. Its massive form is like thousands of elephants strong, The mighty power of millions of horses rushes along. With every step, a new shape, like a shapeshifter's trace, A still lake, a rushing river, a heavy waterfall in space. Be it burning bodies, yearning eyes, or minds in strife, The pure Niagara brings comfort and dampens every life. To quench whose thirst do the lake and river meet? The sky bows down, as clouds pour water at its feet. The water-light rains down like crystals in a shower, Sounding as if Goddess S...

अलौकिक नियाग्रा जलप्रपात (कविता)

( Niagara Falls  की अलौकिकता को शब्दों से दर्शाती कविता) सौंदर्य असीमित अखण्ड है, विहंगम विशाल प्रचण्ड है। प्रकृति का अतुलित प्रताप है, अद्भुत नियाग्रा जलप्रपात है। इसके अनहद अनंत आकार हैं, जैसे प्रकट जलदेव साकार हैं। उतरती अविरल धवल जल धारा है, जैसे क्षीर सागर ने धरा का पाँव पखारा है। गंगा उमड़ी हों जैसे मन में संकल्प लिये एक, चलीं हों करने शिवलिंगों का अखण्ड अभिषेक। हज़ारों हाथियों-सी इसकी विशाल काया है, करोड़ों अश्वों का महाबल इसमें समाया है। पग-पग नया रंग-रूप इसका, जैसे इच्छाधारी है, थिर है झील, बहता दरिया, झरना गिरता भारी है। तपते तन हों, विरहे नयन हों या हों उलझे मन, निर्मल नियाग्रा नम करता हर जीवन।  किसकी प्यास बुझाने मिल नदी-और झील रहे हैं? झुका है गगन, भर-भर बादल जल उचील रहे हैं। जल-ज्योति जैसे बरसते स्फटिक मूसलाधार हैं, स्वर ऐसा जैसे मगन शारदे छेड़ें वीणा के तार हैं। सौंदर्य इसका सहज ध्यान का कुण्ड है, जल-समाधि में डुबो दे ऐसा जल-शुण्ड है। भीषण जलधारा पाषाणों से टकराती है, हदर-हदर नाद नगाड़ों-सी आती है। पत्त्थर से टकराकर वो खण्ड-खण्ड हो जाता है, उसके भेष बदलने क...

तिरंगे की पुकार

(तिरंगा फहराने जब कोई जाता है, तो उसके भाव फहराने वाले से…) फहरा लो आज मुझे, क्योंकि जश्न है, पर ठहरो! हाथ धुले हैं क्या, प्रश्न है? क्योंकि हर अंग जो पावन   अर्जित हैं, उनके पीछे उनके सर्वस्व विसर्जित हैं। गड़ा हुआ झंडा है जिस दर पे, अंदर झाँको कौन दफ़न है, सपूत भीषण पहरा दे रहे हैं, ओढ़े नहीं अभी कफ़न है। खड़ा तिरंगा तना हुआ है, जिस डण्डी के ढाँचे पे, वह कुछ और नहीं है, बापू राह दिखाते इस साँचे पे। डोर जो लटक रही है, साक्षी है आँखों के ख़्वाबों की। जिनको देखते हुए अस्त हुए, यह आशा की डोर आफ़ताबों की। आँचल जिनके उन्मुक्त फहर रहे हैं, आँसू गीले हैं अभी उनकी आँखों के, रातों में माँओं ने ख़्वाब सिले  हैं, दिन में बिसराकर तारे आँखों के।  चक्र जो तुम यह देख रहे हो, कुछ और नहीं, है बिंदी माथों की। करने सदा यह देश अलंकृत, क़ुर्बान हुई मेहंदी जज़्बातों की। है कसौटी, ग़र हो काले हाथ, तो न लगाना, काले मन से खोखली सलामी न लगाना। हो साफ़ हाथ अगर, औ’ अंतस  धुला है, तुम्हारे शीश बरसाने, मन  में  फूल घुला है। -काशी की क़लम 

मित्र (कविता)

बन्धन मुक्त रहें तभी सम्बंधों की समृद्धि है, लदने-लादने से नहीं होती किसी की वृद्धि है। शर्तों की मिलावट से रिश्तों की घटती शुद्धि है, शर्तों से शंकाओं और शिक़वों की होती सिद्धी है। जब तक तौलते हैं रिश्तों को लेन-देन के तराज़ू में, रिश्ते के मुँह में राम रहते और छुरी रहती बाजू में। जब भी कभी एक पलड़ा हल्का पड़ जाएगा, भारी वाला उसको बचाने नहीं बढ़ आएगा। गिरने से अधिक कुछ भी होता आसान नहीं, गिरते को उठाने सकें सभी ऐसे भाग्यवान नहीं। भारी पलड़ा भी गिरने की रीत ख़ूब निभाएगा,  हल्का होके हल्के के बराबर हो जाएगा। इन सब रिश्तों को छोड़ जो ऊपर जाएगा, ख़ून का भले न हो, वो मित्रवर कहलाएगा। जब ख़ून के रिश्ते करके बोझिल डुबोएँगे, नैया पार लगाने बन साहिल आ जाएँगे। ये क़ब्र नहीं हैं पर हर राज़ दफ़न कर जाते हैं, कोई भी काण्ड करो, ये ग़बन कर जाते हैं। क़िताब पढ़ने में भले ही ये पीछे रह जाते हैं, मित्र के चेहरे को सरपट रट जाते हैं। बचपन से वृद्धापन की ज़िंदगी में कई पन हैं, रिश्तों की क़तार में हो सकता अकेलापन है। मित्रता के रिश्ते में जो अनोखा अपनापन है, मित्र मिलें किसी मोड़ पे, ज़िन्दगी बचपन है।...