मित्र (कविता)
बन्धन मुक्त रहें तभी सम्बंधों की समृद्धि है, लदने-लादने से नहीं होती किसी की वृद्धि है। शर्तों की मिलावट से रिश्तों की घटती शुद्धि है, शर्तों से शंकाओं और शिक़वों की होती सिद्धी है। जब तक तौलते हैं रिश्तों को लेन-देन के तराज़ू में, रिश्ते के मुँह में राम रहते और छुरी रहती बाजू में। जब भी कभी एक पलड़ा हल्का पड़ जाएगा, भारी वाला उसको बचाने नहीं बढ़ आएगा। गिरने से अधिक कुछ भी होता आसान नहीं, गिरते को उठाने सकें सभी ऐसे भाग्यवान नहीं। भारी पलड़ा भी गिरने की रीत ख़ूब निभाएगा, हल्का होके हल्के के बराबर हो जाएगा। इन सब रिश्तों को छोड़ जो ऊपर जाएगा, ख़ून का भले न हो, वो मित्रवर कहलाएगा। जब ख़ून के रिश्ते करके बोझिल डुबोएँगे, नैया पार लगाने बन साहिल आ जाएँगे। ये क़ब्र नहीं हैं पर हर राज़ दफ़न कर जाते हैं, कोई भी काण्ड करो, ये ग़बन कर जाते हैं। क़िताब पढ़ने में भले ही ये पीछे रह जाते हैं, मित्र के चेहरे को सरपट रट जाते हैं। बचपन से वृद्धापन की ज़िंदगी में कई पन हैं, रिश्तों की क़तार में हो सकता अकेलापन है। मित्रता के रिश्ते में जो अनोखा अपनापन है, मित्र मिलें किसी मोड़ पे, ज़िन्दगी बचपन है।...