अलौकिक नियाग्रा जलप्रपात (कविता)
सौंदर्य असीमित अखण्ड है, विहंगम विशाल प्रचण्ड है। प्रकृति का अतुलित प्रताप है, अद्भुत नियाग्रा जलप्रपात है। इसके अनहद अनंत आकार हैं, जैसे प्रकट जलदेव साकार हैं। उतरती अविरल धवल जल धारा है, जैसे क्षीर सागर ने धरा का पाँव पखारा है। गंगा उमड़ी हों जैसे मन में संकल्प लिये एक, चलीं हों करने शिवलिंगों का अखण्ड अभिषेक। हज़ारों हाथियों-सी इसकी विशाल काया है, करोड़ों अश्वों का महाबल इसमें समाया है। पग-पग नया रंग-रूप इसका, जैसे इच्छाधारी है, थिर है झील, बहता दरिया, झरना गिरता भारी है। तपते तन हों, विरहे नयन हों या हों उलझे मन, निर्मल नियाग्रा नम करता हर जीवन। किसकी प्यास बुझाने मिल नदी-और झील रहे हैं? झुका है गगन, भर-भर मेघ पानी उचील रहे हैं। जल-ज्योति जैसे बरसते स्फटिक मूसलाधार हैं, स्वर ऐसा जैसे मगन शारदे छेड़ें वीणा के तार हैं। सौंदर्य इसका सहज ध्यान का कुण्ड है, जल-समाधि में डुबो दे ऐसा जल-शुण्ड है। भीषण जलधारा पाषाणों से टकराती है, हदर-हदर नाद नगाड़ों-सी आती है। जलधारा ने सदियों से दी सतत सदाएँ हैं, अजर रहेगी सभ्यता जैसे अजर हवाएँ हैं। पत्त्थर से टकराकर वो खण्ड-खण्ड हो जाता ...