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बेहतरी के दो तरीक़े: तराशना और गलाकर ढालना

ख़ुद को बेहतर बनाने के दो तरीक़े हैं। पहला है ख़ुद तराशने का। इसमें बेहतरी धीमी और परत-दर-परत होती है। दूसरा तरीक़ा क्रांतिकारी है: ख़ुद को गलाकर ढालने का। जैसे किसी धातु को ऊँचे तापमान पर गलाकर मनचाही मूरत साँचें में बनाई जाती है, ठीक वैसे ही, ख़ुद को श्रम की भट्ठी में गलाकर मनचाहा आकार दिया जाता है। ख़ुद को तराशने या गलाने का चुनाव बेहतरी की ज़रूरत और उससे भी कहीं बढ़कर संकल्प-शक्ति पर निर्भर करता है। -काशी की क़लम  There are two ways to become a better version of yourself. The first is to chisel yourself. In this approach, improvement is gradual, happening layer by layer. The second way is more revolutionary: to melt and reshape yourself. Just as a piece of metal is melted at a high temperature and then cast into the desired shape, you too can reshape yourself by melting in the furnace of hard work and discipline. Whether you choose to chisel yourself or melt yourself depends on the extent of the transformation you seek—and even more so on the strength of your resolve. (Translat...

गूँज दबते स्वरों की. स्वानुभव और अपनी संलग्नता से उपजी कहानियाँ . राम सुधार सिंह

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'गूँज दबते स्वरों की' ( Goonj, Dabte Swaron Ki) स्वानुभव और अपनी संलग्नता से उपजी कहानियाँ  'गूँज दबते स्वरों की' नवीन सिंह द्वारा लिखी गई पन्द्रह कहानियों का संग्रह है। संग्रह की कहानियों के बारे में कहने के पहले कथाकार नवीन के बारे में कुछ बताना ज़रूरी है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जपद में १९८६ में जन्मे नवीन सिंह ने अभियांत्रिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर पहले दक्षिण कोरिया और अब यूनाइटेड स्टेट्स में सेवारत हैं। नवीन के भीतर साहित्य का बीजन्वपन उदय प्रताप कॉलेज में इण्टर की कक्षाओं में पढ़ते समय हुआ। कभी डॉ. केदारनाथ सिंह ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि "मैं जिस कॉलेज में पढ़ता था वहाँ कविता के कीटाणु बहुत अधिक थे। मैं उदय प्रताप कॉलेज का छात्र था। यदि मैं वहाँ का छात्र नहीं होता तो और चाहे जो कुछ होता, कवि नहीं होता।" कॉलेज के उसी कीटाणु ने नवीन के भीतर साहित्य के संस्कार दिये। दक्षिण कोरिया में कार्य करते हुए हिंदी और कोरियन संस्कृति के समन्वय का बड़ा प्रयास किया। नवीन की बहुत-सी कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सम्मान प्राप्त कर चुक...

महानता की एक मूक परिभाषा। A mute definition of greatness.

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महानता। इस शब्द की अनेक परिभाषाएँ हैं। बँधे शब्दों में, स्वार्थ से ऊपर उठकर किये गए व्यवहार व्यक्ति को महान बनाते हैं। त्याग, समर्पण, प्रेम, परोपकार, निश्छलता, इत्यादि व्यवहार महानता के बीज हैं। लोकप्रियता। जरूरी नहीं कि लोकप्रियता महानता हो। सोशल मीडिया के दौर में यह बात और भी अहम हो जाती है। ऐसे में, महानता की हुई अपनी एक अनुभूति आपसे साझा करना चाहूँगा।  जिसके सानिध्य में आकर आपका क़द बड़ा लगने लगे, जो आपको बड़े होने की अभिभूति करवा दे, वो महान है। आजकल चलन में इसका उल्टा देखने को मिलता है। लोग बड़प्पन बटोरते चलते हैं। महान लोगों से मिली बड़प्पन की अनुभूति औपचारिक नहीं, आत्मीय होती है। ऐसे व्यक्तित्व कभी उपदेश नहीं देते, बल्कि उनका जीवन, उनका व्यवहार ही गीता-रामायण होता है। जरूरत सिर्फ़ पढ़ने और अनुसरण करने की होती है। हमारे आस-पास बहुत-सी ऐसी सख़्शियतें होती हैं, जिनसे हम प्रेरित होते हैं, या हो सकते हैं । प्रेरणा का स्रोत यदि लोकल हो तो, यह और असरदार होता है। ऐसे व्यक्तित्व हमारे ही परिवेश में संघर्ष करके एक अनुकरणीय प्रतिमान बन जाते हैं। कोयले को उस कोयले से प्रेरित होना चाहिए,...

Curiosity is the key to success in the Artificial Intelligence (AI) era.

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Curiosity is the mother of knowledge . With the advent of AI , our knowledge will take backseat and curiosity would hold the steering. Hence, it is important to remain curious and ask questions; it doesn’t matter even if they turn out to be silly.  Historically, these questions have lead humanity to inventions and discoveries . Newton ’s ‘why did apple fall, why it did not fly?’ has the set humanity for the universe. Our curiosity will be key for thriving in AI era .  Questions, not the answers makes us intelligent. Reason: good questions are born out of knowledge. In AI era, prompts (questions/ commands to AI) to will decide the level of answers from the same AI. How to be curious?: keeping childhood alive; shunning ignorance and exploring. Be curious. -Kashi’s Pen ——— जिज्ञासा ज्ञान की जननी है। AI के आगमन के साथ हमारा ज्ञान पीछे की सीट पर चला जाएगा और जिज्ञासा स्टीयरिंग थामेगी। इसलिए जिज्ञासु बने रहना और प्रश्न पूछना महत्वपूर्ण है; यदि वे प्रश्न साधारण या मूर्खतापूर्ण भी ल...

फूल (कविता)

जब लबों ने लिहाज़ किया तो आखों ने किये इशारे, दिल से दिल की बात पहुँचे फूलों के सहारे। फूल डाकिये हैं पहुँचाते हैं जज़्बातों को, जो बयाँ न कर सके, कहते हैं उन बातों को। खिलखिलाते हैं ख़ुशी में चार चाँद लगाते हैं, सूख जाते हैं ग़म में आँसू पोंछने आते हैं। ख़ता हुई हो तो बनके माफ़ीनामा जाते हैं, कुंद करते तलवार, सुलहनामा लिखाते हैं। इज़हार-ए-इश्क़ में घबराते हैं फूल इक़रार-ए-इश्क़ में मुस्कुराते हैं फूल  इनकार-ए-इश्क़ में मुरझाते हैं फूल  टकरार-ए-इश्क़ में जल जाते हैं फूल  फूल सहानुभूति हैं, अथ और इति हैं। तम में ज्योति हैं, फूल जागृति हैं। फूल भक्ति हैं, फूल शक्ति हैं। -काशी की क़लम

कोरी लिस्ट (लघु कथा)

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मदन और मोहन दोस्त थे। एक दिन वे मंदिर गए। मदन हमेशा तैयारी करके जाता था। तैयार रहना उसकी आदत ही नहीं, बल्कि लत थी। अपनी पढ़ाई, नौकरी, शादी यहाँ तक कि अपने बच्चों की भी फ्यूचर प्लानिंग करके रखा था। मंदिर के पुजारी ने दोनों दोस्तों से बोला, “ माँगो, भगवान दिल खोल के देंगे।” मदन लाइन में मोहन के पीछे था। वो झट-पट मोहन के आगे आ गया। जैसे ट्रेन की तत्काल टिकट बुक करवाना हो। पहले न किए तो फ़ुल! मदन अपनी मन्नतों की लिस्ट साथ लाया था। उसने लिस्ट खोली और भगवान के सामने पढ़ने लगा, “ यूपीएससी क्लियर करवा दीजिए, यूपीएससी वाली लड़की से शादी करवा दीजिए…” आवाज़ काफ़ी जोर-जोर से आ रही थी । पुजारी जी ने टोका, “ बेटा, मन में मन्नत माँगो, प्रभु समझ जाएँगे।” मदन थोड़ा झेंपा।जैसे-तैसे एक पन्ने की अपनी अर्ज़ी सुना डाली। जैसे कोई गृहस्थी वाला परचून की दुकान पर लिस्ट पढ़ता हो। अब मोहन की बारी आई। पुजारी जी, “ बेटा, थोड़ा शॉर्ट में ही रखना। लाइन बहुत लम्बी है।” परन्तु मोहन के पास कोई लिस्ट नहीं थी। उसने मन में बोला, “ प्रभु, माँगकर आपको शर्मिंदा नहीं करूँगा। आप जो भी देंगे उसी में संतोष करूँगा।” इतना मन में कह...

चावल-दाल vs. Carb-Protein

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पहले खाने में चावल-दाल होता था, अब कार्ब-प्रोटीन (कार्बोहाइड्रेट-प्रोटीन) हो गया है। खाना उल्लास से खाया जाता था, अब डर-डर के खाया जा रहा है। खाना उपहार हुआ करता था, उपहास बनने लगा है। खाना रिश्तों को जोड़ता था, कार्ब-प्रोटीन सबको disintegrate कर रहे हैं। उत्सव होने वाला खाना, भाग-दौड़ में औपचारिकता बनके रह गया है। रोटी के लिए रोज़ी हो रही है, पर रोटी लिए वक़्त नहीं है। सब बैठके खाना जोहते थे, अभी टेबल पे कार्ब-प्रोटीन सबका इंतज़ार कर रहे हैं।  कार्ब-प्रोटीन है पर पोषण ग़ायब है। ये न तो तन को लग रहे हैं, न ही मन को और न ही जीवन को।  खाने पे बहुत ध्यान देने की ज़रूरत है। ऐसे खाने की ज़रूरत है जैसे कभी मिला न हो। खाने और आपके बीच किसी etiquette की दीवार न हो। खाने के लिए आपकी पृथ्वी परिक्रमा करना बंद करनी चाहिए। संसार ठहरना चाहिए। -काशी की क़लम  Chawal-Daal Vs. Carb.-Protein

ज़िंदगी की दुल्हन (कविता)

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ज़िंदगी की दुल्हन संग चल रही है मेरी तेज़ घड़ी से तंग चल रही है। संग जीके भी ये कैसी दीवार है! न घूँघट उठा न हुआ दीदार है। जी रहे हैं या बिताये जा रहे हैं?  ज़िंदगी रस्म-सी निभाये जा रहे हैं। घड़ियाँ बदल-बदलके देख रहा हूँ, कोई तो अपना वक़्त बताएगी, निरेख रहा हूँ।  ज़िंदगी हर पल नया अफ़साना है, यह दुल्हन तो रंग-रूप का ख़ज़ाना है। सूखा है बाढ़ है पतझड़ या बहार है  ज़िन्दगी जो भी है, तुझसे प्यार है। -काशी की क़लम  Zindagi Ki Dulhan ( Poem)

प्रेमी पथ (कविता)

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मंज़िल, दूर से लगती बड़ी मुश्क़िल है, नज़दीक से पाया, ये तो नरम दिल है। मंज़िल से पहले शंकाएँ मिल जाती हैं, लेने धैर्य-परीक्षा मज़िलें बल खाती हैं। सोचके बाधाओं की, पग न बढ़ा जाता है, लगता है मज़िल-मार्ग टेढ़ा-मेढ़ा जाता है।  मज़िल भावी भविष्य, कोरा सपना है, पथ प्रकाशपुंज ही तो केवल अपना है।  मंज़िल की चाह में हम राहों से बेवफ़ा हुए, प्रेमी तो पथ हैं, न दफ़ा हुए न खफ़ा हुए। मज़िलें छलावा, कोरे काग़ज़, बेमाइने हैं, रास्ते तो रौशनी, कहानी औ’ आईने हैं। -काशी की क़लम

कच्चाई

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वो कच्चे मक़ान कच्ची सड़कें कच्ची गलियाँ कच्चे आँगन कच्चे दालान कच्चे अरमान  कच्चे मेल  कच्चे खेल  अब पक्के होते जा रहे हैं,  लोगों के दिल भी पक्के हो रहे हैं। पक्के, सख़्त पत्थर के जैसे! -काशी की क़लम