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The New Arrival

Curiosity is the key to success in the Artificial Intelligence (AI) era.

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Curiosity is the mother of knowledge . With the advent of AI , our knowledge will take backseat and curiosity would hold the steering. Hence, it is important to remain curious and ask questions; it doesn’t matter even if they turn out to be silly.  Historically, these questions have lead humanity to inventions and discoveries . Newton ’s ‘why did apple fall, why it did not fly?’ has the set humanity for the universe. Our curiosity will be key for thriving in AI era .  Questions, not the answers makes us intelligent. Reason: good questions are born out of knowledge. In AI era, prompts (questions/ commands to AI) to will decide the level of answers from the same AI. How to be curious?: keeping childhood alive; shunning ignorance and exploring. Be curious. -Kashi’s Pen ——— जिज्ञासा ज्ञान की जननी है। AI के आगमन के साथ हमारा ज्ञान पीछे की सीट पर चला जाएगा और जिज्ञासा स्टीयरिंग थामेगी। इसलिए जिज्ञासु बने रहना और प्रश्न पूछना महत्वपूर्ण है; यदि वे प्रश्न साधारण या मूर्खतापूर्ण भी ल...

फूल (कविता)

जब लबों ने लिहाज़ किया तो आखों ने किये इशारे, दिल से दिल की बात पहुँचे फूलों के सहारे। फूल डाकिये हैं पहुँचाते हैं जज़्बातों को, जो बयाँ न कर सके, कहते हैं उन बातों को। खिलखिलाते हैं ख़ुशी में चार चाँद लगाते हैं, सूख जाते हैं ग़म में आँसू पोंछने आते हैं। ख़ता हुई हो तो बनके माफ़ीनामा जाते हैं, कुंद करते तलवार, सुलहनामा लिखाते हैं। इज़हार-ए-इश्क़ में घबराते हैं फूल इक़रार-ए-इश्क़ में मुस्कुराते हैं फूल  इनकार-ए-इश्क़ में मुरझाते हैं फूल  टकरार-ए-इश्क़ में जल जाते हैं फूल  फूल सहानुभूति हैं, अथ और इति हैं। तम में ज्योति हैं, फूल जागृति हैं। फूल भक्ति हैं, फूल शक्ति हैं। -काशी की क़लम

कोरी लिस्ट (लघु कथा)

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मदन और मोहन दोस्त थे। एक दिन वे मंदिर गए। मदन हमेशा तैयारी करके जाता था। तैयार रहना उसकी आदत ही नहीं, बल्कि लत थी। अपनी पढ़ाई, नौकरी, शादी यहाँ तक कि अपने बच्चों की भी फ्यूचर प्लानिंग करके रखा था। मंदिर के पुजारी ने दोनों दोस्तों से बोला, “ माँगो, भगवान दिल खोल के देंगे।” मदन लाइन में मोहन के पीछे था। वो झट-पट मोहन के आगे आ गया। जैसे ट्रेन की तत्काल टिकट बुक करवाना हो। पहले न किए तो फ़ुल! मदन अपनी मन्नतों की लिस्ट साथ लाया था। उसने लिस्ट खोली और भगवान के सामने पढ़ने लगा, “ यूपीएससी क्लियर करवा दीजिए, यूपीएससी वाली लड़की से शादी करवा दीजिए…” आवाज़ काफ़ी जोर-जोर से आ रही थी । पुजारी जी ने टोका, “ बेटा, मन में मन्नत माँगो, प्रभु समझ जाएँगे।” मदन थोड़ा झेंपा।जैसे-तैसे एक पन्ने की अपनी अर्ज़ी सुना डाली। जैसे कोई गृहस्थी वाला परचून की दुकान पर लिस्ट पढ़ता हो। अब मोहन की बारी आई। पुजारी जी, “ बेटा, थोड़ा शॉर्ट में ही रखना। लाइन बहुत लम्बी है।” परन्तु मोहन के पास कोई लिस्ट नहीं थी। उसने मन में बोला, “ प्रभु, माँगकर आपको शर्मिंदा नहीं करूँगा। आप जो भी देंगे उसी में संतोष करूँगा।” इतना मन में कह...

चावल-दाल vs. Carb-Protein

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पहले खाने में चावल-दाल होता था, अब कार्ब-प्रोटीन (कार्बोहाइड्रेट-प्रोटीन) हो गया है। खाना उल्लास से खाया जाता था, अब डर-डर के खाया जा रहा है। खाना उपहार हुआ करता था, उपहास बनने लगा है। खाना रिश्तों को जोड़ता था, कार्ब-प्रोटीन सबको disintegrate कर रहे हैं। उत्सव होने वाला खाना, भाग-दौड़ में औपचारिकता बनके रह गया है। रोटी के लिए रोज़ी हो रही है, पर रोटी लिए वक़्त नहीं है। सब बैठके खाना जोहते थे, अभी टेबल पे कार्ब-प्रोटीन सबका इंतज़ार कर रहे हैं।  कार्ब-प्रोटीन है पर पोषण ग़ायब है। ये न तो तन को लग रहे हैं, न ही मन को और न ही जीवन को।  खाने पे बहुत ध्यान देने की ज़रूरत है। ऐसे खाने की ज़रूरत है जैसे कभी मिला न हो। खाने और आपके बीच किसी etiquette की दीवार न हो। खाने के लिए आपकी पृथ्वी परिक्रमा करना बंद करनी चाहिए। संसार ठहरना चाहिए। -काशी की क़लम  Chawal-Daal Vs. Carb.-Protein

ज़िंदगी की दुल्हन (कविता)

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ज़िंदगी की दुल्हन संग चल रही है मेरी तेज़ घड़ी से तंग चल रही है। संग जीके भी ये कैसी दीवार है! न घूँघट उठा न हुआ दीदार है। जी रहे हैं या बिताये जा रहे हैं?  ज़िंदगी रस्म-सी निभाये जा रहे हैं। घड़ियाँ बदल-बदलके देख रहा हूँ, कोई तो अपना वक़्त बताएगी, निरेख रहा हूँ।  ज़िंदगी हर पल नया अफ़साना है, यह दुल्हन तो रंग-रूप का ख़ज़ाना है। सूखा है बाढ़ है पतझड़ या बहार है  ज़िन्दगी जो भी है, तुझसे प्यार है। -काशी की क़लम  Zindagi Ki Dulhan ( Poem)

प्रेमी पथ (कविता)

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मंज़िल, दूर से लगती बड़ी मुश्क़िल है, नज़दीक से पाया, ये तो नरम दिल है। मंज़िल से पहले शंकाएँ मिल जाती हैं, लेने धैर्य-परीक्षा मज़िलें बल खाती हैं। सोचके बाधाओं की, पग न बढ़ा जाता है, लगता है मज़िल-मार्ग टेढ़ा-मेढ़ा जाता है।  मज़िल भावी भविष्य, कोरा सपना है, पथ प्रकाशपुंज ही तो केवल अपना है।  मंज़िल की चाह में हम राहों से बेवफ़ा हुए, प्रेमी तो पथ हैं, न दफ़ा हुए न खफ़ा हुए। मज़िलें छलावा, कोरे काग़ज़, बेमाइने हैं, रास्ते तो रौशनी, कहानी औ’ आईने हैं। -काशी की क़लम

कच्चाई

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वो कच्चे मक़ान कच्ची सड़कें कच्ची गलियाँ कच्चे आँगन कच्चे दालान कच्चे अरमान  कच्चे मेल  कच्चे खेल  अब पक्के होते जा रहे हैं,  लोगों के दिल भी पक्के हो रहे हैं। पक्के, सख़्त पत्थर के जैसे! -काशी की क़लम

तुम फिर याद आए…, इरफ़ान ख़ान

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आजकल प्लानिंग का ज़माना है। मेहमान भी पूछ कर या बता कर आते हैं। वो कौए अब न रहे जो मेहमानों के आने की आहट देते थे। बच्चे पैदा एक निर्धारित समय पे हो रहे हैं। पहले जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति भाग्य को प्रभावित करते थे। अब जन्म भी अनुकूल ग्रह-नक्षत्रों के हिसाब से हो रहे हैं। मृत्यु। अब मृत्यु की भी प्लानिंग होने लगी है। प्लानिंग के इस दौर में कैसा लगता है जब कुछ अप्रत्याशित होता है! हमें भी कुछ ऐसा ही लगा था। हाल ही में हम एक दुकान में अपने ऑर्डर की प्रतीक्षा कर रहे थे। दीवार पे चल रही टीवी से कोई जाना-पहचाना चेहरा बार-बार झाँके जा रहा था। मेरी यादाश्त पे दस्तक़ हो रही थी। हॉलीवुड की मूवी थी,पर मेरी पहचान से परे। पता चला ‘लाइफ़ ऑफ़ पाई’ के एक्टर सूरज शर्मा जी हैं। तभी इरफ़ान ख़ान जी भी बड़ी-बड़ी, गहरी आँखों से झाँक रहे थे। उनकी उम्दा अदाकारी, संवेदनशील शख़्सियत, सब ताज़ा हो गईं। उनका बेवक़्त दुनिया से रुख़्सत होना एक व्यक्तिगत क्षति थी। उनके जाने पे कुछ शब्द छलके थे। उनको साझा कर रहा हूँ। रिपीट है, पर उभर आया है, तो कृपया एक बार और पोंछ दीजिए। Irrfan Khan सिनेमा का एक तारा जो ...

सृजन के विभिन्न चरण और उनसे उतरती हुई गीता की पेंटिंग।

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 इस सुंदर चित्र का सृजन गीता के हाथों हुआ है । सृजन की प्रकिया के कई चरण होते हैं । कभी कोई ख़याल मन को छू जाता है । कभी कोई बात चुभ जाती है । कभी दुनिया को बदलने की ठानी जाती है । कभी भविष्य में झाँकने का मन करता है । कभी एक अपने मन की दुनिया की कल्पना होती है । इस तरह उपजती है एक सोच । यह सृजन का पहला चरण होता है। फिर इसको अमली जामा पहनाना पहनाने पर विचार होता है। विचार के संचार के लिए साधन की ज़रूरत होती है। कला। एक सोच को संसार में संचारित करने के लिए कला ही एक मात्र साधन है। कला के इस पहलू का उपयोग विज्ञान, तकनीकी, इत्यादि ब्रह्माण्ड के सभी क्षेत्रों में होता है। यहाँ कला को संकुचित विचारधारा से देखने पर शायद समझ नहीं आए। कला को टेक्निकल तौर पर देखने के बजाय इसकी सृजन शक्ति को जानना की आवश्यकता है। नए-नए आविष्कार कला के गर्भ से निकलते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने द्वारिका नगरी के सृजन के लिए स्वयं सृजन-देव विश्वकर्मा जी से विनती की थी। सृजन का अगला चरण है संचार के माध्यम का चुनाव। शब्द, चित्र, स्वर, इत्यादि अभिव्यक्ति के संचार के साधन हैं। इन मूलभूत माध्यमों के कई स्वरूप विकसित हो...

ज़ीने (सीढ़ियाँ)

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(ज़ीना-सीढ़ी)  लिफ़्ट के दौर में ज़ीने जो बिसर जाएँगे भुलाकर बहाना पसीना किधर जाएँगे? तरक़्क़ी मुबारक़ हो बुलंदियों की, मगर  चढ़ न सकेंगे दोबारा, जो नज़र से उतर जाएँगे।   ज़ीने  ज़मीर हैं, इन्हें न ठुकराइये ज़नाब ! आपात में आप ज़ीने की ही डगर जाएँगे। औरों की गवाही से साबित क्या होगा जब आप आप से ही मुक़र जाएँगे। दग़ा देगी लिफ़्ट जो, ये ज़ीने याद करना ज़ीने के रास्ते मुक़द्दर आपके घर जाएँगे। -काशी की क़लम