ज़िंदगी और मैं…(कविता)
ज़िंदगी और मैं…(कविता) ज़िन्दगी और मेरा कुछ यूँ सिलसिला रहा, माँगा जो मिला नहीं पर नहीं कोई गिला रहा। ज़िन्दगी पे बहुत दावे रहे, पर इसके न कोई वादे रहे, मेरी क़ाबिलियत से परे देने के इसके हमेशा इरादे रहे। मैं तो था खोटा सिक्का, ज़िन्दगी ने जहान में चलाया, चलना न सकता था उसे घोड़ों की दौड़ में दौड़ाया। इस गँवार को ज़िन्दगी ने इतना प्यार दिया, चुका न पाऊँ मैं कभी इतना उधार दिया। दौलत शोहरत की आरज़ू किसे है आख़िर, दिल-ओ-जान से मुसाफ़िर के हों कुछ मुंतज़िर। ज़िंदगी तेरी मियाद मुझसे लोग सालों में पूछते रहे, हिसाब क्या बताऊँ कि हम ज़िंदगी साँसों में जीते रहे। मनचाहे गीतों की प्लेलिस्ट मुराद में आती रही, पर अच्छे रहे हैं गीत, रेडियो से तुम जो भी सुनाती रही। -काशी की क़लम