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अतिलघु कथा : पानी-पत्ती

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नमस्कार ! आज जब हर काम करने से पहले हम सोचते हैं कि इसमें मेरा क्या फ़ायदा है, रिश्तों में मतलब निकालते हैं, उस समय यह कहानी जिसका शीर्षक है पानी-पत्ती सम्बन्धो को निभाने और कृतज्ञ बने रहने की प्रेरणा देती है।  ठण्ड में ठहरा हुआ पानी जम रहा था।  पानी के ऊपर एक पत्ती तैर रही थी ।  बड़े ही आनंद में हिलोरे लेती , कभी इठलाती, हरदम नहाती, तरो ताज़ा महसूस करती।  पानी एक दिन पत्ती बोला- यहाँ से निकल जाओ अभी माहौल सही नहीं है।  मज़े लेने बसंत में फिर आना। इतनी ठंडी तुम्हारे सेहत के लिए ठीक नहीं है। मेरी चिंता मत करना, जमना, पिघलना तो मेरी आदत है।  पत्ती नहीं मानी,  बोली- कुछ भी हो साथ ही रहूँगी ।  पारा थकते-थकते शून्य से भी नीचे जा गिरा। हर जगह बस सफ़ेद रंग की चादर दिखती। मानो प्रकृति ने सफ़ेद चादर ओढ़ ली हो।  जिसका परिणाम यह हुआ कि पत्ती भी बर्फ के गर्भ में धंस गयी। लेकिन साँस ले रही थी।  बर्फ़ बड़े गुस्से में था, लेकिन पत्ती को उस समय कुछ बोलने के बजाय उसकी जान बचाने में लग गया। बर्फ अपनी सा...

पीपल के झरोखे से :भाग १

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सादर प्रणाम !     आशा करता हूँ आप सकुशल होंगे तभी पढ़ने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं। हमारे यहाँ पीपल का पेड़ काटने की परम्परा नहीं है , भगवान का वास माना जाता है। इनकी पूजा होती है । यह बात वैज्ञानिक रूप से भी मददगार है कि पीपल की लकड़ी के जलने से निकलने वाली गैस स्वास्थ्य के लिये अति हानिकारक होती है । परिणाम, पीपल के पेड़ों को कोई हाँथ नहीं लगाता है , और उनकी उम्र सैकड़ों साल हो जाती है । एक पेड़ अपने जीवन में मानव जीवन की अनेक पीढ़ियों का साक्षी बनता है । होने वाले बदलाओं को महसूस करता है । आदमी की विकास की गाथा का अमुक कथाकार होता है । ऐसे ही एक पेड़ की आवाज़ को शब्द देने का प्रयास कर रहा हूँ मैं ।  (करते करते स्याही ज्यादा खर्च हो गयी है, अग्रिम माफ़ी 🙏) आज के लोग बहुत ख़ुश दिख रहे हैं, लेकिन ये ख़ुश तभी दिखते हैं जब सबके साथ रहते हैं। असली में ख़ुश हैं, मुझे संदेह है । क्योंकि मेरी छाया में अकेले जब छहांते हैं तो इनकी अनकही पीढ़ा, मायूसी मैं पढ़ लेता हूँ । थोड़ी देर पहले का रंगीन चेहरा जैसे श्वेत-श्याम हो जाता है। वैसे चेहरे का र...

हर मन राम, हर घर रामायण

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राम राम जी 🙏! आप जानते ही होंगे कि किसके नाम का पत्थर तैरता है ? पत्थर भला कैसे तैर सकता है ? ...  कुछ नाम में हल्कापन होगा ? जी नहीं, वो नाम बहुत ही वजनी है । उस नाम के भार को और गहराई से समझने का समय आ गया है। ये भार कैसा है ? उत्तरदायित्व है उनके मानव रूप में आकर एक आदर्श मानव रूप को प्रस्तुत करने का । मानवीय मूल्यों को चरितार्थ करने हेतु स्वयं को तपाने का। ख़ुद का त्याग करने का । दिवाली मनाने से पहले १४ साल वनवास सहन करने की क्षमता का । ख़ुद से पहले दूसरों को रखने का । हर साँस को पर सेवा में समर्पित करने का । इस बात की गाँठ बाँधने का कि चाहे रावण कितना ही विद्वान, बलवान, स्वर्णवान क्यों न हो, मंशा मात्र का प्रदूषण उसका विध्वंस कर सकती है । अलख जगाने का कि हमारे आजीवन कर्मों में इतना दम हो कि अंतिम दम ‘हे राम’ कहने का दम भर सके । यह नाम हर रिश्तों को निभाने की एक बुनियाद है। चाहे वो पिता- पुत्र का हो, जहाँ कुल परम्परा की रक्षा के लिये वनवास रहना पड़े । या फिर भाई- भाई का ,जहाँ सिंहासन सहोदर भ्राता के आगे  तुच्छ हो जाता है । यहीं नहीं भरत भी खड़ाऊं...

बहू भी बेटी जैसी: एपिसोड २- बाबा जी का सुझाव - सास दबंग, तुम और दबंग ।थोड़ा सम्हाल लो तो सब प्रसन्न।

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विवाह तय होने के बहुत रास्ते हैं।  अगर प्रेम विवाह हो तो लड़की की मर्ज़ी थोड़ी बहुत चल जाती है। लेकिन अरेंज मैरिज में बेचारी लड़की को फोटो भी शादी तय होने के बाद ही दिखाया जाता है।माता- पिता भला ही सोचते हैं । इसलिये पसंद-नापसंद करने की रंच मात्र भी गुंजाईश नहीं होती। फिर लड़की कल्पनाओं का संसार बुनती है , जो मिला है उसी में खुशियों के तराने तलाशती है। सकरात्मता की एक मिसाल है ये स्वीकारता। अगर कुछ कह दें तो सीधा मतलब बग़ावत से निकाला जाता है। वैसे अब माहौल कछुए की चाल से लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है ।       जैसा कि पिछले एपिसोड में आपने पढ़ा की लड़की की शादी अर्रेंज मैरेज के तहत अमली जामा पहनने वाली होती है , लड़की आगे आने वाले वैवाहिक जीवन को लेकर बड़ी चिंतित रहती है। उसके जेहन में  सेल वाले बैग की यादें ताजा रहती हैं। बहुत सम्हल के कदम रखना चाहती है।  ऐसे में उसकी एक सखी ने किसी ज्योतिषी से सलाह लेने की राय दी। ज्योतिषी महाशय नामी गिरामी हैं। उनके द्वारा की गयी भविष्यवाणियों के किस्से भी सुनाये। लड़की को आशा की लकीर दिखी और बाबा जी के चरणों म...

जमने के रास्ते :गांधी या आँधी

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अगर कभी आपने पशुओं के व्यवहार का अवलोकन किया हो तो इस पन्ने पर अंकित संदेश आप तक आसानी से पहुँच जायेगा । अगर नहीं कर पाये हों तो और आसानी से समझ में आ जायेगा क्योंकि तब आपने चौपाये से अधिक दोपाये मानव का अवलोकन किया होगा। चौपाये किसी के घर पर हों तो बड़े परस्पर के साथ रहते हैं।  गाय, भैंस ,बकरी इत्यादि एक ही मालिक के घर बड़े ही सौहार्द्र के साथ रहते हैं। अब अगर मालिक को इनमें से किसी भी प्रजाती का एक और लाना पड़ जाये तो बाकी सब जो पहले से ही बंधे हैं, को थोड़ा खल जाता है। मालिक से नहीं। उससे रंज होके चारे का मोहताज़ थोड़े ही नहीं होना है। वो खफ़ा होते हैं आने वाले नये सदस्य से। भले ही नया वाला खाली खूंटे पर आ गया हो , उसकी नाद अलग हो, पगहा नया आया हो । सांड़ में भाँड़ न बना हो तब भी इनको तकलीफ हो जाती है। आख़िर क्यों होती है ये दिक्कत ? ये तो पशु हैं , आप-आप ही चरने वाले हैं।  पहले से लेकर अंतिम तक अपने में ही डूबे रहते हैं  इत्यादि थोड़ा बहुत आकलन किया जा सकता है इस व्यव्हार के कारण का । नये वाले को सिंग मरना ,होंफना ,डरा कर रखना...

रेलीय अखाड़ा , रुमाली दाव !

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नमस्ते !  कोरिया का सार्वजनिक यातायात तंत्र बेहद ही अच्छा और उपयोगी  है।एक तरफ जहाँ मेट्रो ट्रेनें इस तंत्र की रीढ़ की हड्डी हैं , वहीं पर बसें भी कोने-कोने तक लोगों को ढोने वाली पसलियाँ ।  मेट्रो और बसों  का आपस में करार है की वो अपने यात्रियों  की मिलकर सेवा करेंगे।  कुल मिलाकर एक यात्रा का एक ही टिकट काटेंगे । सीओल मेट्रो विश्व की  चुनिंदा और बेहतरीन मेट्रो सेवाओं में से एक है।  रद्द होना , देर से आना  इत्यादि आलसी और  लापरवाह काम नहीं करती है।  अब बात कि  रेल में कितनी भीड़ होती है ? तो अगर मैं ये बोलूँ कि मेट्रो की भीड़ पीक टाइम पे उतनी ही होती है, जितनी की हमारे यहाँ दीवाली में स्लीपर क्लास में होती है, तो थोड़ी सी अतिशयोक्ति हो जायेगी। ये पीक टाइम होता है सुबह और शाम ऑफिस वाला। कम समयांतराल पर ट्रेनें होना भी कम भीड़ का कारण है । भीड़ कितनी ही क्यों न हो , लोग कतार  में ही चढ़ते और उतरते  हैं।  कभी भी एक-दूसरे को धक्का  देते हुए मैंने किसी को नहीं देखा। Subway Station in ...

उप-नामकरण के तारे

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नमस्ते 🙏!  अगर आप यह कागज़ पढ़ पा रहे हैं तो स्वाभाविक है कि आप स्कूल , कॉलेज पक्का गये होंगे । जहाँ पर शुरू में मम्मी- पापा  आपका जाँच-परख के दिये हुये नाम से दाख़िला कराते हैं । लेकिन जैसे-जैसे कॉलेज 🏛️ का काल-चक्र चलता जाता है , आपको एक नये नाम मिलने के योग बनते जाते हैं । जी हाँ, अगर आप अभी तक आकलन लगा पा रहें है  इस  पन्ने के विषय का तो मन-ही-मन  शाबाश बोल लीजिये ।किसी भी रेकॉर्ड में न लिखे जाने वाले इस अटल नाम को मेरी  भाषा में उपनाम कहते हैं । इस उपनाम की असली नाम से बड़ी सारी भिन्नतायें हैं । फिर भी ये दोनों एक ही आदमी के साथ आजीवन शांतिपूर्ण रहकर एक सुदृढ़ लोकतान्त्रिक व्यवस्था के जवलन्त उदाहरण का काम करते हैं। असली नाम माता-पिता आपके जन्म के ग्रह-नक्षत्रों ☄★ के हिसाब से रखवाते हैं । उपयुक्त नाम रखने का उद्देश्य होता है कि इससे प्रेरित होके आप चाँद-मंगल पर जाने जैसा कुछ तूफ़ानी कर्म करें । उपनाम रखा जाता है आपके कर्मों के को देख कर । आपका व्यवहार ही आपके उपनाम के लिये तारा होता है ।  असली नाम में ...

बहू भी बेटी जैसी : एपिसोड १- बहू , बेटी और बैग

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नमस्ते 🙏!  मेरे  क ,  ख ,  ग  वाले  पहले  पोस्ट  को  हाँथों  हाँथ  लेने  के  लिये  भारी  भरकम  आभार। अहसास  हुआ  कि  काशी  के  इस  देसी  कागज  के  ग्लोबल  व्यूज़ 👁️👁️ भी  हो  सकते  हैं ।  कुछ  अग्रजों  ने  तो  बोला  कि  वे  अगली  कड़ी  का  इंतज़ार  करेंगे।  इससे  आकांक्षाओं  के  दबाव  में  कलम  थोड़ी  गाढ़ी  हो  गयी  है ।  प्रयास  कर  रहा  हूँ ,  थोड़ा  सम्भाल  लीजियेगा।   जिस  किताब  का  ज़िक्र  मैंने  किया  था,  उसका  केंद्र  बिंदु  है  सास - बहू।  किताब  के  कुछ  पन्ने  पढ़ते  समय  स्मृति  इरानी  वाला  ‘ क्योंकि  सास  भी  कभी  बहू  थी ’...