कुछ तो रही मज़बूरी होगी (कविता)


कुछ तो रही मज़बूरी होगी

जो उसने बनाई दूरी होगी। 

याद घुली न हो तेरी जिसमें

ली गई हर वो साँस अधूरी होगी।


वायदे तोड़ना उसकी फ़ितरत नहीं

ज़रूर रही कोई दीवार दस्तूरी होगी।


अलविदा कह दूँगा, पर वायदा करो

अगले जनम मुलाक़ात ज़रूरी होगी।


ज़माने में इश्क़ की इबादत होती रहेगी

इसके पीछे तेरी-मेरी भी सबूरी होगी।


-काशी की क़लम (Kashi Ki Kalam)


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

महानता की एक मूक परिभाषा। A mute definition of greatness.

कोरी लिस्ट (लघु कथा)

Artificial Intelligence (AI): अदृश्य पहलू और उनके प्रभाव (भाग-1)