तिरंगे की पुकार

(तिरंगा फहराने जब कोई जाता है, तो उसके भाव फहराने वाले से…)

फहरा लो आज मुझे, क्योंकि जश्न है,

पर ठहरो! हाथ धुले हैं क्या, प्रश्न है?

क्योंकि हर अंग जो पावन अर्जित हैं,

उनके पीछे उनके सर्वस्व विसर्जित हैं।


गड़ा हुआ झंडा है जिस दर पे,

अंदर झाँको कौन दफ़न है,

सपूत भीषण पहरा दे रहे हैं,

ओढ़े नहीं अभी कफ़न है।


खड़ा तिरंगा तना हुआ है,

जिस डण्डी के ढाँचे पे,

वह कुछ और नहीं है,

बापू राह दिखाते इस साँचे पे।


डोर जो लटक रही है,

साक्षी है आँखों के ख़्वाबों की।

जिनको देखते हुए अस्त हुए,

यह आशा की डोर आफ़ताबों की।


आँचल जिनके उन्मुक्त फहर रहे हैं,

आँसू गीले हैं अभी उनकी आँखों के,

रातों में माँओं ने ख़्वाब सिले हैं,

दिन में बिसराकर तारे आँखों के। 


चक्र जो तुम यह देख रहे हो,

कुछ और नहीं, है बिंदी माथों की।

करने सदा यह देश अलंकृत,

क़ुर्बान हुई मेहंदी जज़्बातों की।


है कसौटी, ग़र हो काले हाथ, तो न लगाना,

काले मन से खोखली सलामी न लगाना।

हो साफ़ हाथ अगर, औ’अंतस धुला है,

तुम्हारे शीश बरसाने, मन में फूल घुला है।

-काशी की क़लम 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

महानता की एक मूक परिभाषा। A mute definition of greatness.

कोरी लिस्ट (लघु कथा)

Artificial Intelligence (AI): अदृश्य पहलू और उनके प्रभाव (भाग-1)