मित्र (कविता)
बन्धन मुक्त रहें तभी सम्बंधों की समृद्धि है,
लदने-लादने से नहीं होती किसी की वृद्धि है।
शर्तों की मिलावट से रिश्तों की घटती शुद्धि है,
शर्तों से शंकाओं और शिक़वों की होती सिद्धी है।
जब तक तौलते हैं रिश्तों को लेन-देन के तराज़ू में,
रिश्ते के मुँह में राम रहते और छुरी रहती बाजू में।
जब भी कभी एक पलड़ा हल्का पड़ जाएगा,
भारी वाला उसको बचाने नहीं बढ़ आएगा।
गिरने से अधिक कुछ भी होता आसान नहीं,
गिरते को उठाने सकें सभी ऐसे भाग्यवान नहीं।
भारी पलड़ा भी गिरने की रीत ख़ूब निभाएगा,
हल्का होके हल्के के बराबर हो जाएगा।
इन सब रिश्तों को छोड़ जो ऊपर जाएगा,
ख़ून का भले न हो, वो मित्रवर कहलाएगा।
जब ख़ून के रिश्ते करके बोझिल डुबोएँगे,
नैया पार लगाने बन साहिल आ जाएँगे।
ये क़ब्र नहीं हैं पर हर राज़ दफ़न कर जाते हैं,
कोई भी काण्ड करो, ये ग़बन कर जाते हैं।
क़िताब पढ़ने में भले ही ये पीछे रह जाते हैं,
मित्र के चेहरे को सरपट रट जाते हैं।
बचपन से वृद्धापन की ज़िंदगी में कई पन हैं,
रिश्तों की क़तार में हो सकता अकेलापन है।
मित्रता के रिश्ते में जो अनोखा अपनापन है,
मित्र मिलें किसी मोड़ पे, ज़िन्दगी बचपन है।
कहलाते हैं मित्र सभी, सच्चे की क्या पहचान है?
गुल हो जाए बत्ती रात में, वो डिबरी-सा दीप्तिमान है।
समय कमज़ोर करे कभी, सब भागते छोड़के मैदान हैं,
दंगल करते काल से भी, असल मित्र होते पहलवान हैं।
सही करो या ग़लत दोस्त समता से साथ निभाते हैं,
पीड़ा में हो मित्र अगर धरती-अम्बर सिर उठाते हैं।
कृष्ण बनके जीवन की महाभारत का रण जितवाते हैं
दोस्ती के नाम पे तो मर-मिटेने वाले कर्ण बन जाते हैं।
सिर्फ़ ज़मीन-ज़ायदाद में हक़ जताने को रिश्तेदार हैं,
सुख में भले पीछे रहें दोस्त, दुःख में पूरे भागीदार हैं।
ये बीमा हैं पर जीवन रहते किश्त नहीं भरवाते हैं,
ये ज़िन्दगी के बाद भी दोस्ती का दस्तूर निभाते हैं।
पतझड़ विदा करके बसन्त का रहता इंतज़ार है,
सावन क्या भादो क्या! मित्र रहता सदाबहार है।
वक़्त पे मुँह मोड़ने वाले रिश्तों को धिक्कार है,
भरोसे का वज़ूद मित्र से, मित्र की जयकार है।
-काशी की क़लम
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