गूँज दबते स्वरों की. स्वानुभव और अपनी संलग्नता से उपजी कहानियाँ . राम सुधार सिंह
'गूँज दबते स्वरों की' ( Goonj, Dabte Swaron Ki)
स्वानुभव और अपनी संलग्नता से उपजी कहानियाँ
'गूँज दबते स्वरों की' नवीन सिंह द्वारा लिखी गई पन्द्रह कहानियों का संग्रह है। संग्रह की कहानियों के बारे में कहने के पहले कथाकार नवीन के बारे में कुछ बताना ज़रूरी है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जपद में १९८६ में जन्मे नवीन सिंह ने अभियांत्रिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त कर पहले दक्षिण कोरिया और अब यूनाइटेड स्टेट्स में सेवारत हैं। नवीन के भीतर साहित्य का बीजन्वपन उदय प्रताप कॉलेज में इण्टर की कक्षाओं में पढ़ते समय हुआ। कभी डॉ. केदारनाथ सिंह ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि "मैं जिस कॉलेज में पढ़ता था वहाँ कविता के कीटाणु बहुत अधिक थे। मैं उदय प्रताप कॉलेज का छात्र था। यदि मैं वहाँ का छात्र नहीं होता तो और चाहे जो कुछ होता, कवि नहीं होता।" कॉलेज के उसी कीटाणु ने नवीन के भीतर साहित्य के संस्कार दिये। दक्षिण कोरिया में कार्य करते हुए हिंदी और कोरियन संस्कृति के समन्वय का बड़ा प्रयास किया। नवीन की बहुत-सी कहानियाँ और कविताएँ विभिन्न राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सम्मान प्राप्त कर चुकी हैं।
किसी भी लेखन के मुख्यतः दो आधार होते हैं। एक-लेखक का स्वानुभव और अपनी संलग्नता। ऐसी रचना लेखक के भीतर से उपजती है। ऐसी रचना में पाठक लेखक की संवेदना, उसकी साँसों की आवाजाही और अनुभवों के दबाव से उपजती विकलता से रु-ब-रू होते हैं। इस तरह के लेखन की तासीर अलग होती है। लेखन का दूसरा आधार-सूचना और सूचनापरक ज्ञान की विपुलता है। आज का समय सूचना-क्रांति का समय है। किसी भी विषय की सारी सूचनाएँ एक क्लिक पर सामने उपस्थित हो जाती हैं। सूचनाओं की इस विपुलता में अक्सर संवेदनाएँ छिप जाती हैं। ऐसी रचनाएँ तड़क-भड़क चाहे जितनी कर लें, पाठक के मन को छू नहीं पाती हैं। मेरी दृष्टि में वही रचयिता श्रेष्ठ है जिसमें यथार्थ के धरातल पर संवेदना की गहराई हो और उसमें मानवीय मूल्यों की प्रतिष्ठा हो। युवा कथाकार की कहानियाँ इस कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती हैं। केमिकल इंजीनियर होते हुए भी नवीन ने जीवन के विविध क्षेत्रों के अनुभव को बड़ी कुशलता के साथ कथा के रूप में प्रस्तुत किया है।
संग्रह के शीर्षक को थोड़े बदलाव के साथ अंत में स्थान दिया गया है। इस कहानी में जिस समस्या को केंद्र में उठाया गया है, वह वर्तमान समय की सर्वाधिक संवेदनशील समस्या है। परिवार में किसी बुज़ुर्ग का उपेक्षित हो जाना, एकल परिवार की नियति है। परिवार के मुखिया दीनानाथ जी ऐसे परिवार में थे जहाँ एक की सुखी दूसरे पर झलकती थी। दीनानाथ जी सभी को जीवन जीने की कला सिखाते थे। वे जानवर पानले के बड़े शौक़ीन थे, किन्तु बढ़ते समय ने परिवार को छोटा कर दिया और धीरे-धीरे दीनानाथ जी बिल्कुल अकेले रह गए, केवल मोती उनके साथी रह गये। इस अकेलेपन की व्यथा को कहानी में मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
संग्रह की पहली कहानी 'सफ़ेद वर्दी ' पड़ोसी देश पाकिस्तान द्वारा आतंकी गतिविधयों के बीच देशभक्त डॉ. करीम के बलिदान की कहानी है। 'गठरी' और 'गठरी वापसी' दोनों कहानियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं। गठरी प्रतीक है किसी के एहसान का। बबिता के पिता उसके विवाह के समय इंद्रदेव से कर्ज लेकर दहेज की माँग पूरी करते हैं। बाद में इंद्रदेव का पोता बबिता की छोटी बहन से बदतमीज़ियाँ करता है। शिकायत लेकर सरिता के पिता इंद्रदेव से शिक़ायत करने जाते हैं किन्तु गठरी के बोझ से दबे होने के कारण घर आकर झूठ बोलते हैं। बाद में सरिता की माँ सत्य बोलकर गठरी की वापसी कर दी। 'आधी शाहदत' मोर्चे पर अपने पाँव गवाँ चुके सूबेदार की पीड़ा की कहानी है। अपनी पीड़ा को व्यक्त करते हुए सूबेदार का कथन है कि "हाँ भाई, अब शरीर में बचे हुए लंगोट में भी छेद करने वाले हैं। मिल रही पेंशन पर टैक्स लगाना शुरु करेंगे। इससे अच्छा होता कि यह लंगोट ही ले लेते। तिरंगे में लिपटे को तो बहुत सलामी मिलती है, नंगा सैनिक देखकर लोगों को सैनिक के इस बदहाल रूप के भी दर्शन होते।"'काग़ज़ की क़श्ती' दो मित्रों की सरतियों की मार्मिक कहानी है। 'पल दो पल, अपने भी' बूढ़े माँ-बाप के वृद्धाश्रम भेजे जाने तथा उनसे मिले वाली सीख से सम्बंधित कहानी है। 'पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया' में शिक्षानीति को लेकर राजनेताओं पर गहरा व्यंग किया गया है। 'पगली' गहरे मानवीय सरोकार की कहानी है। 'रंग-बिरंगे फूल और काँटें' चुनावी राजनीति और स्वार्थी राजनेताओं द्वारा बोये जाने वाले साम्प्रदायिक दंश की कहानी है। यह कहानी चुनाव के समय बिछायी जाने वाली बिसात का यथार्थ चित्रण करती है। 'किसान की बारिश' सरकारी नीतियों की पोल खोलने वाली कहानी है। घुरहू काका बेबाक ढंग से पूरे भ्रष्टाचार को उखाड़ कर रख देते हैं। 'सावन की समीर-लीला' प्रेम के बीच देशभक्ति की रोचक गाथा है। 'विजयी भारत की टीम' और 'नालेबा का शोध: एक प्रतिशोध' एक अगल फ्रेम की प्रेरणादायक कहानियाँ हैं।
नवीन की कहानियों की भाषा सरल, सुबोध होते हुए भी कसी हुई है। जरूरत के मुताबिक कहीं-कहीं सफ़ेद, दाग़दार, शक़, फ़िजा, बेमक़सद, बामज़िल जैसे अरबी, फ़ारसी के शब्दों का प्रयोग भाषा को प्रभावशाली बनाता है। स्थान-स्थान पर मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग से भाषा और सशक्त को गई है। उदाहरण के लिए-'ज़िन्दगी का मक़सद ख़त्म। कब्र की दुआ क़ुबूल होने की राह में', वे निर्जीव रेगिस्तान में भी नागफनी के जीवन को पाने जाने की चेष्टा करते', ‘नेताओं का दबाव सर पर रखे भीगे बोझे की तरह बढ़ता ही जा रहा था' जैसे प्रयोगों को देखा जा सकता है। कहानी की भाषा कहीं-कही पूरी तरह से काव्यात्मक हो गई है। इस तरह के विवरण लेखक की कवित्व क्षमता के परिचायक हैं। कुछ उदहारण द्रष्टव्य हैं -'भाव हो तो आदमी भवसागर को भी पार कर जाता है। ' 'झूठ बोलना एक बात है, उसको पचा जाना एक कला।' 'इस झूठ से वे बेटी की लाज को समय के साहूकार को गिरवी रख आये थे।' 'बिना तेल पिये लाठी सुखंडी रोग से ग्रसित बच्चे के सामान होगी।' आदि।
कहानी का प्रारम्भ हर कथाकार अपने ढंग से करता है। वह कहानी की माँग के अनुसार भी प्रारम्भ करता है। प्रसाद जी ने तो 'आकाशदीप' का प्रारम्भ संवाद से ही किया है। नवीन ने अपनी कहानियों का प्रारम्भ कहीं घटनाओं के विवरण से, कहीं परिवेश के चित्रण के साथ और कहीं सीधे पात्र परिचय से किया है। संग्रह की पहली कहानी 'सफ़ेद वर्दी' की शुरुआत सघन वैचारिकता के साथ हुई है-
"भारत के इतिहास को लिखने में अनेक रंगों के क़तरों का योगदान रहा है, लेकिन कुछ रंग हमेशा से प्रश्नवाचक चिन्ह से ज़्यादा कुछ नहीं लिख पाए। असंख्य क़तरे मिलकर भी कभी वतनपरस्ती का मक़ाम नहीं लिख पाए। उनकी देशभक्ति हमेशा से कुछ कुटिल बुद्धियों की क़ातिलाना साये से बरी नहीं हो सकी। जैसे सफ़ेद रंग की स्याही में काली स्याही का क़तरा सफ़ेद के ईमान की दाग़दार कर देता है और सफेदी हमेशा अपने अस्तित्व पर कालिख के शक़ का जामा पहनकर सच्चाई की दुहाई देती हो। एक-दो नापाक़ मछलियाँ हमेशा पूरी फ़िजा को दूसरी अच्छी मछलियों के लिए ज़हरीला करती रहीं।" कहानी की इस गूढ़ार्थ प्रस्तावना को पाठक कहानी पढ़ने के बाद अच्छी तरह समझ लेता है। पात्रों का चरित्र-चित्रण करते समय वाक्य छोटे-छोटे और पात्र के व्यक्तित्व को खोल देने में पूरी तरह समर्थ हैं। 'गठरी' कहानी के इंद्रदेव जी के व्यक्तित्व का परिचय देते हुए कहा गया है -
"इंद्रदेव जी के पास समस्या पहुँचने का मतलब था, तुरन्त निदान। सैकड़ों बीघे के काश्तकार। दान-धर्म में अटूट आस्था। छह फ़ीट का क़द। हमेशा ताव दी हुई मूछें। चेहरे पर हमेशा मंद मुस्कान। बुढ़ापे में भी सूरज जैसा चमकता ललाट। कपास जैसे सफ़ेद बाल। छप्पन इंच का सीना। सीने के अंदर उससे भी विराट ह्रदय। "
प्रस्तुत संग्रह की कहानियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नवीन सिंह के भीतर बड़ी सम्भावना है। विदेश में कार्य करने के कारण उनका अनुभव संसार और बड़ा है। मुझे विश्वास है कि नवीन का अगला कहानी संग्रह पाठकों के बीच और अधिक आदर पायेगा।
-राम सुधार सिंह
Ram Sudhar Singh, Ret. Prof. and HOD, Hindi, Udai Pratap Autonomous College, Varanasi
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें