कवि का मान और दरबारी कवि का हश्र

सादर प्रणाम,

आजकल बहुतेरे Motivational speakers, कवि, लेखक गण पुराने मझे हुए, सिद्ध कथा वाचकों के मन का सुकून छीन रहे हैं। इसी क्रम में हिंदी मंच के चमकते सितारे, हम सभी के प्यारे आदरणीय डॉ. कुमार विश्वास जी कुछ दिनों पहले राम कथा सुना रहे थे। आयोजन सरकार का था। स्वयं मुख्यमंत्री जी राम कथा का रस ले रहे थे। बीच कथा में मुख्यमंत्री जी को किन्हीं कारणों से जाना पड़ा। अन्य श्रोताओं का ध्यान रामकथा से हटकर, मुख्यमंत्री जी के जाने पे लग गया। कथा वाचक जी ने लोगों के मन में मचे उस वैचारिक भगदड़ को जैसे-तैसे क़ाबू किया। 


काशी की क़लम ने कुछ हलचल की:

-बीच में बिन बताए इस क़दर जाना राम-रामकथा तथा कथाकार का अनादर है।

-कितना सुखद होता कि आदरणीय मंत्री जी कथाकार जी को अपने जाने की पूर्व सूचना भिजवाते। इससे मंत्री जी का मान और बढ़ता ही। कुछ आपात बात हुई होगी, जो ऐसे चले गए। यह कहकर मैं संतोष कर रहा हूँ, मंत्री जी की हिंदी और राम की आस्था में मेरी अगाध आस्था है।

-यह अनादर जितना कथाकार का है, उतना ही हिंदी भाषा-साहित्य का भी है।

-साहित्य समाज का दर्पण है, और समाज के झण्डाबरदार ही ऐसा रूख करें, तो दर्पण लज्जावश टूटना चाहता है। 

-कार्यक्रम सरकारी था, तो कविवर दरबारी कवि की भूमिका में थे। दरबारी कवियों का हश्र आज भी वही है, जो पहले हुआ करता था। क्या वक़्त वाक़ई में चल रहा है? 

-एक प्रेरक प्रसंग: ब्रिटिश राज में BHU में वाइसरॉय (viceroy) के सामने लकड़ी जैसा सूखा आदमी बोलने खड़ा हुआ। वो अंग्रेज़ी भाषा को लताड़ रहा था। वो हिंदी और अन्य भाषाओं की महत्ता बता रहा था। उस आदमी को ज़माना गांधी नाम बुलाता है। अर्थात्, दरबार किसी का हो, हिम्मती पखेरू परवाज़ भर सकता है। (गांधी जी का भाषण)

-काशी की क़लम

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